रायपुर। देश में इन दिनों सिर्फ एक ही चर्चा है, वह है संजयलीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावत”। इस फिल्म पर जहां तलवारें तनी हुई हैं। राजपूत और क्षत्रिय विरोध में हैं तो सुप्रीम कोर्ट ने अभिव्यक्ति की आजादी का हवाला देकर कह दिया है कि फिल्म प्रदर्शित की जाए, राज्य सरकारें सुरक्षा दें।

आखिर ‘पद्मावत” में ऐसा क्या है? इसका जवाब फिल्म प्रदर्शित होने के बाद ही मिलेगा। अगर आप पद्मावती के बारे में पढ़ना चाह रहे हैं तो राजधानी स्थित आनंद समाज वाचनालय में इसका हिन्दी अनुवाद पढ़ सकते हैं। यहां इसकी दो प्रतियां 100 साल से भी अधिक समय से हैं।

इसमें न तो तारीख लिखी है, न यहां के रिकॉर्ड में इसके खरीदने की तारीख है। इन दिनों स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत चल रहे जीर्णोद्धार के दौरान रेक की सफाई की गई तो यह दुर्लभ काव्य निकला।

इसमें कवि मलिक मोहम्मद जायसी ने पद्मावती के रूप का बखान ऐसा किया है कि आप पढ़ते ही रह जाएंगे।सूर्ख लाल रंग के कवर वाली यह किताब जितनी वजनी है, उतना इसके अंदर लिखा एक-एक शब्द भी।

दीपा, स्मार्ट सिटी में कार्यरत हैं। उन्हें पद्मावत को पढ़ने का मौका मिला तो वे चूकी नहीं। वे कहती हैं-कविताओं में रानी इतनी खूबसूरत हैं तो वास्तव में कितनी खूबसूरत रही होंगी।

जानकारी के मुताबिक कम से कम 50 साल से इस काव्य को किसी ने इश्यू नहीं करवाया, क्योंकि किसी को यह पता ही नहीं था कि इस काव्य पर बनी किताब कोहराम मचा देगी। पद्मावत ही है काव्य का नाम: संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावती, अलाउद्दीन खिलजी और रत्नसिंह पर केंद्रित है।

जिस काव्य को आधार बनाकर इसे बनाई गई, दरअसल उस काव्य का नामही पद्मावत है। विरोध के बाद भंसाली को फिल्म का नाम पद्मावत करना ही पड़ा।

ये है महाकाव्य में जिक्र

– सोने से अलंकृत मांग में जो सिंदूर की रेखा है वह ऐसी शोभित है मानो रंग भरी बसंत ऋ तु जगत में दिखाई पड़ रही हो…।

– पुष्पों में सजी वेणी ऐसी लगती थी मानो कालिया नाग की नागिनी कलम पुष्प लिए हुए जमुना से बाहर निकली हो…।

– जब वह केशों के ऊपर अपनी ओढ़नी का चीर ढंकती है तो ज्ञात होता है जैसे अंध्ोरे में क्षण भर के लिए बिजली चमक गई हो…।

– द्वितीया के चंद्रमा से भी उसका ललाट अधिक कांतिमान है…। शोभा में उसकी समता न करने के कारण चंद्रमा अदृश्य हो जाता है। जो अमावस्या होती है वह इसी कारण कि चंद्रमा लजाकर छिप जाता है।

खंडवार है उल्लेख

महाकाव्य में पद्मावती के जन्म से लेकर उनकी रूप गाथा, राजा रत्नसिंह, अलाउद्दीन, युद्ध का खंडवार उल्लेख किया गया है। इसे आसानी से समझा जा सकता है। हालांकि हिंदी काफी क्लीस्ट है, लेकिन समझी जा सकती है। कविता और वाक्यों के रूप में इसे संयोजित किया गया है।

– मैं 10 साल से यहां पदस्थ हूं, कभी किसी ने पद्मावत महाकाव्य को पढ़ने के लिए नहीं मांगा। यह दुर्लभ किताब है, हमारे पास इसकी 2 प्रतियां हैं। हां, अब फिल्म आ रही है तो जरूर लोग सच्चाई जानने और पढ़ने आएंगे। -अनिता तिवारी, आनंद समाज वाचनालय

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