भोपाल। भोपाल में दो व तीन दिसंबर 1984 की दरमियानी रात को हुए दुनिया के भयावह गैस कांड का 346 मीट्रिक टन जहरीला कचरा 36 साल बाद भी नष्ट नहीं किया जा सका है। इसके लिए दिल्ली से आने वाली उस रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है, जिसमें इस बात का पता चलेगा कि इंदौर के पीथमपुर में नष्ट किए 10 मीट्रिक टन कचरे का पर्यावरण और प्रकृति पर कोई दुष्‍प्रभाव तो नहीं पड़ा है। इस रिपोर्ट के आधार पर ही बचे 346 मीट्रिक टन कचरे के निपटान की कार्रवाई तय होनी है। यह निपटान 2015 में हुआ था, इसकी रिपोर्ट केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय और केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय को तैयार कर भेजनी है, जो अब तक नहीं मिली है। बता दें कि यूनियन कार्बाइड कारखाने की मालिक कंपनी डाउ केमिकल्‍स के परिसर में 346 मीट्रिक टन जहरीला कचरा मौजूद है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर इंदौर पीथमपुर में 10 मीट्रिक टन कचरे का निपटान किया है। इस निपटान से पर्यावरण पर कितना असर- दुष्‍प्रभाव पड़ा, इसकी रिपोर्ट का खुलासा होना बाकी है। मप्र के पास इस जहरीले कचरे के निपटाने के लिए न तो विशेषज्ञ है, न कोई व्यवस्था है। इस वजह से राज्य सरकार अपने स्तर पर कोई निर्णय नहीं ले पा रही है। यही वजह है कि मामले में सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ा है। यह कचरा यूनियन कार्बाइड कारखाने के जेपी नगर स्थित कवर्ड शेड में है जो कि गैस राहत एवं पुनर्वास विभाग के अधीन है। टीएसडीएफ संयंत्र का किया था प्रयोग : जहरीले कचरे का निपटान 13-18 अगस्त 2015 तक पीथमपुर में रामकी कंपनी में हुआ था। कंपनी के इंसीनरेटर में जहरीला कचरा जलाया गया था। ट्रीटमेंट स्टोरेज डिस्पोजल फेसीलिटीज (टीएसडीएफ) संयंत्र का उपयोग किया गया था। पूर्व में उक्त जहरीले कचरे को जर्मनी भेजने का प्रस्ताव भी आया था, लेकिन जर्मन नागरिकों ने इसका विरोध कर दिया। इसलिए मामला अटक गया। इस तरह के केमिकल को 2000 डिग्री से अधिक तापमान पर जलाया जाता है। 

इंदौर में 10 मीट्रिक टन कचरे का निपटान किया था। उसकी रिपोर्ट केंद्र को उसी समय भेज दी गई थी। उसके दिशा-निर्देशों का इंतजार कर रहे हैं। यह उच्च स्तरीय मामला है इसलिए केंद्रीय स्तर से इस पर बहुत सावधानी से अध्ययन किया जा रहा है। केंद्रीय स्तर से ही निपटाने की प्रक्रिया भी तय होनी है।

– बसंत कुर्रे, संचालक गैस राहत एवं पुनर्वास विभाग, मप्र

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